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Tuesday, February 25, 2025

पत्थर दिल

सुनाई नहीं देता तुम्हें!!

सुधा वह मेहमानों के लिये गद्दों की व्यवस्था करनी है । कब से कह रहा हूँ ।सुनाई नहीं देता तुम्हें।" मेरे पति ने जोर से कहा तो मुझे गुस्सा आ गया।

"तो मैं क्या बैठी हुई हूँ।जब देखो रोब दिखाते है आप।" मैने जबाब दिया तो चुपचाप जाकर पारुल(उनकी बहन) से कुछ कहने लगे।

आज मेरी बेटी की शादी है।हम दोनों कई दिनो से तैयारियो मे लगे हैं।ना खाने की सुध ना सोने की।

मुझे बिट्टी के जुदाई का बहुत दुख था।आँखें भर भर आ रही थी। कल से मैं खुब रोई भी हूँ। बिट्टी ने भी रो रोकर बुरा हाल कर लिया है।

पर मेरे पति के चैहरे पर कोई शिकन नही है।यह आदमी इंसान है या पत्थर?

पहले भी जब तब बच्चों को उनकी गलती पर डाँटने की आदत थी ।गुस्सा नाक पर रहता है।

खैर शादी अच्छे से हो गई।सुबह विदाई के वक्त मैं बिट्टी से टिपट कर बहुत रोई। मेरी आँखें सुज गयीं।बिट्टी काबी यही हाल था पर उन्होंने बस उसके सिर पर हाथ फेरा और हलुवाई, टेंट , दुधवाले का हिसाब करने मे व्यस्त हो गये।

बिल्कुल पत्थरदिल है यह आदमी।सीने मे दिल ही नही है। शायद सारे मर्द ऐसे ही होते हैं।निर्दयी।मैने सोचा।

मुझे यह भी ख्याल नहीं आया कि एक एक रुपये की व्यवस्था इन्होंने कैसे की होगी और शादी के अन्य कामों की व्यवस्था भी।

दोपहर का वक्त था।

मेरी आँखे सुज कर लाल हो गई थी। मैने खाना खा लिया और इनका इंतजार कर रही थी।

यह कमरे मे आये तो मैने खाना परोस दिया और इनके बगल मे बैठ गई।

उन्होंने कुछ देर मेरी आँखों मे देखा और फिर अचानक ही मेरी गोद मे गिर कर बिलख बिलख कर रो पडे।

मेरा कलेजा सन्न रह गया।

उन्होंने खाने को एक तरफ सरका दिया और रोते हुए बोले - "मुझसे नहीं खाया जाएगा सुधा।मेरे कलेजे का टुकडा चला गया , मैं खाना कैसे खा पाउँगा।"

तब मुझे ख्याल आया कि इन्होंने तो कल सुबह से ही खाना नही खाया है। मुझे अपनी ओछी सोच पर ग्लानि होने लगी।

मैने तो खाना भी खा लिया और यह इंसान अपनी बेटी के जुदाई के गम मे कल से भुखा है। इस पत्थर के नीचे प्यार का मीठा झरना भी बह रहा है यह मुझे आज मालुम हुआ।

ये मर्द भी अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं बस हम औरतो की तरह दिखा नही पाते।

मुझे अपने पति पर बहुत प्यार आया।मैने खाना लिया और उनके मुँह के पास ले गई। उन्होंने मुँह नही खोला ।

मेरे मुँह से निकला "आपको आपकी बिट्टी की कसम।"

उन्होंने झट से कौर मुँह मे ले लिया ।

आँसूँ अभी भी उनकी आँखो से बहे जा रहे थे।और मेरी भी।

पत्थर मोम हो गया था

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