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Tuesday, June 18, 2019

मैं अकेला

कभी खुद से बातें करता हूँ, कभी खुद को तन्हा पाता हूँ,
ये समय अजब है जीवन का, खुद को भी समझ न आता हूँ,

कभी तन्हां जीवन लगे भला, कोई बंदिश नहीं, ना ज़िम्मेदारी
कभी लगे काटने यादें आ, सब कुछ करना, हो सर भारी,

कभी लगे उड़ जाऊ पंखा लगा, नए आकाश में दूरो मैं,
कभी लगे कट गए पंख मेरे, अब कैसे रहू अकेले मैं,

कभी पैर फैला के सोना यूँ, जैसे सारा आकाश मेरा,
कभी सोच सोच के ये रोना, तन्हा काटे बिस्तर मेरा,

कभी शोर से बच गए सोच सोच, मन में बजती है तरल तरंग ,
कभी कोई नहीं है सुनने को, किसकी मैं सुनु, खोई सारी उमंग ,

कभी ये सोचु, कोई जिद नहीं, ना कोई धमकाए अच्छा है,
पर ख़ाली घर जब काटे तो, फिर यही लगे दिल बच्चा है,

नहीं रह सकता मैं तेरे बिना, ऐ हमदम मेरे समझ ले तू,
सब छड़ीक भावनाएं है मेरी, जो सोचे रहु अकेले मैं |
बिन बच्चो के, बिन प्यार बिना, नहीं कटता जीवन मेरा है
कुछ दिन ही लगे बरस जैसे, हूँ पड़ा व्यर्थ धरती पर मैं. ||

                                          - अमित कुमार श्रीवास्तव 

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